गन्दी राजनीती को एक नए स्तर पर लेकर गए हैं केजरीवाल

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सरकार की नोटबन्दी के निर्णय के बाद जिस तरह से देश का विपक्ष बौखलाया है वो देखकर आश्चर्य होता है।हम वो देश है जहाँ के प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र में बोलने के लिए विपक्षी पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर जाते हैं और वहां के देश ये देखर हैरान हो जाते हैं कि भारत देश में राष्ट्रहित के लिए लोग पार्टी हित से ऊपर उठकर काम करना जानते हैं,मगर आज की स्थिति सच में विचलित करने वाली है।खासकर दिल्ली के मुख्यमंत्री तो सारी हदें पार कर चुके हैं। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है।दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ट्विटर पर दो बार अफवाह फैलाते पकड़े गए हैं।किसी समाचार चैनल की ‘चुगलखोर आंटी’ की तरह पहली बार उन्होंने अपने एक कार्यकर्ता के एक ट्वीट (जिसमे कथित रूप से एक व्यक्ति जेल में फाँसी लगा रहा है)को बिना किसी जाँच पड़ताल के रिट्वीट करते हुए ये बताने की कोशिश की थी कि वो इंसान नोटबन्दी से परेशान होकर फाँसी लगा रहा है,जबकि बाद में ये पता चला की वो एक चोर था जिसने पुलिस से पकड़े जाने के डर से फाँसी लगा ली।

Kejriwal Rumor

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kejriwal twitter

 

 
दूसरी बार उन्हें तब पकड़ा गया जब वो केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा की लड़की की शादी का हिसाब किताब मांग रहे थे जबकि शादी उनके लड़के की थी।
क्या अब राजनीती का स्तर ये रह गया है जहाँ एक राज्य का मुख्यमंत्री अपनी पार्टी को ‘अफवाह दफ्तर’ बना दे?उनकी ट्विटर ID किसी मुख्यमंत्री का अकाउंट कम और ‘चुगली अड्डा’ ज़्यादा लगता है।
 
 
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देखकर विश्वास नही होता की ये वो व्यक्ति है जिन्हें समाज सेवा के लिए बहुत से पुरस्कार मिल चुके हैं,मगर इनके पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं ने कितनी समाजसेवा की है इसके तो पूरे वीडियो प्रमाण ‘स्टिंग’ रुपी अवतार में देश के सामने पहले ही आ चुके हैं।रमन मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित एक नेता जब देश के प्रधानमंत्री के लिए ‘डरपोक’ और ‘मनोरोगी’ जैसे शब्दों का प्रयोग सोशल मीडिया पर करता है तो विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि देश की राजनीती कितनी नीचे गिर चुकी है।
 
राहुल गांधी अगर ऐसा करते तो दो मिनट के लिए समझ में भी आता है मगर अरविन्द केजरीवाल जैसा व्यक्ति जो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में काम कर चुका है,वो ये बताने से कतराता है कि नोटबन्दी के फायदे क्या हैं?ऊपर से वो देश के लोगों को अफवाह फैला बरगलाने की कोशिश करता है?उनका कहना है उनके पास सारे सबूत हैं और एक फाइल वो हवा में लहराते हुए आजकल पाये जा रहे हैं,मगर आरोप सिद्ध करने में उनकी ‘स्ट्राइक रेट’ कितनी ज़्यादा है इससे पूरा देश परिचित है।70 साल की आज़ादी के बाद भी देश में साक्षरता दर अभी भी बहुत नीचे है।गाँवो में तो और बुरी स्थिति है।ऐसे देश में जब हम कैशलेस अर्थव्यवस्था की बात करते हैं तो इस बात को सोचना भी अपने में बहुत बड़ी बात होती है।
 
इसके बाद होने वाली घटनाओं का आभास पहले ही प्रधानमंत्री को भी था।ये देख आपके बैंक अकाउंट को आपके मोबाइल फोन से जोड़ना एक अच्छी पहल है क्योंकि आज मोबाइल फोन की पहुँच वहां तक है जहाँ आजतक बिजली नही पहुँच पायी।देश के लोगों में अभी तक आधे से ज़्यादा आबादी उन लोगों की थी जिनका अपना बैंक अकाउंट तक नहीं था।ये 70 सालो का किया हुआ काम है।मनमोहन सिंह जो RBI के गवर्नर रहे,देश के वित्त मंत्री रहे,पंच वर्षीय योजनाओ के अध्यक्ष रहे और 10 साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे,इतने बड़े कार्यकाल में वो देश के सभी लोगों का बैंक अकाउंट तक नही खुलवा पाएं और आज उनकी पार्टी संसद में हंगामा खड़े किये हुए है।संसद में बैंक की कतार में मृत्यु हो जाने पर शहीद का दर्जा दिलाने की माँग हो रही है,तो फिर सरहद पर जो मरता है वो कौन है?
 
कल को तो ये भी कहने से लोग नही हिचकेंगे की उसको शहीद क्यों कहें क्योंकि वो तो इसकी तनख्वाह लेता था?कतार में किसी की मृत्यु होनाे बेहद दुखद घटना है परंतु सभी की मृत्यु को नोटबन्दी से जोड़ देना क्या उचित होगा?देश की एक बड़ी आबादी को बैंक अकाउंट से न जोड़ पाना निश्चित रूप से कोई पीठ ठोकने वाला काम तो नही है और अरविन्द केजरीवाल इस बात से पूर्ण रूप से अवगत भी हैं कि अर्थव्यवस्था पर इस नोटबन्दी का क्या दूरगामी असर पड़ेगा।उन्हें ये भी पता है कि इस नोटबन्दी के फायदें क्या है,मगर वो जनता में इसके फायदे गिनाने के बजाए बैंक की कतारों में गिरी लाशें गिना रहे हैं।
 
निश्चित रूप से इससे परेशानी का हल तो दूर-दूर तक नही दिखाई देता उल्टा लोगों की बेचैनी इससे और ज़्यादा बढ़ेगी ही।लाल बहादुर शास्त्री जी जब देश के प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने भी जय जवान-जय किसान का नारा देते हुए देश के लोगों से ये अपील की थी की वो हफ्ते में एक दिन (सोमवार) सिर्फ एक वक्त का ही भोजन करें।लोगों ने इस बात को सहर्ष स्वीकारा था,क्योंकि ये उस समय की ज़रूरत थी।काले धन को खत्म करना आज की ज़रूरत बन चुकी है क्योंकि ये कालाधन हमारी अर्थव्यवस्था के समानांतर एक और अर्थव्यवस्था का सृजन कर रही थी,जिसका कोई हिसाब ही नही था और अरविन्द केजरीवाल तो खुद भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए छाती ठोककर दिल्ली की गद्दी पर बैठे है,तो फिर क्या उन्हें ये नही पता की काला धन इससे खत्म हो जायेगा?या फिर वो इस मुद्दे पर भी उतनी ही ख़ामोशी बरतेंगे जितना उन्होंने नरेंद्र तोमर की फ़र्ज़ी डिग्री पर बरता था?अगर ख़ामोशी भी रखते तो इससे भी देश का भला ही होता,क्योंकि कम से कम ये अफवाह फ़ैलाने से तो बेहतर ही काम है।
 
शीला दीक्षित के खिलाफ 370 पेज का सबूत ही गायब हो गया,पूछने पर कहते हैं कि फाइल LG ने रोक रखी है,तो सर आप तो नोटबंदी पर इतना हल्ला मचा रहे थे,तो उस बात पर इतना हल्ला क्यों नही मचाया?नियत में खोट था।दिल्ली की जनता को कितनी तकलीफ होती होगी जब वो ये देखते होंगे की उनके ही द्वारा 67 सीटों के प्रचंड बहुमत द्वारा चुना गया मुख्यमंत्री अब मात्र एक अफवाह कर्मचारी की तरह व्यवहार कर रहा है।कहा जा रहा है कि लोगों को इससे बहुत ज़्यादा परेशानी हो रही है,निश्चित रूप से हो रही है मगर जनता ने न तो इसे घोटाला कहा और न ही गलत फैसला तो फिर दिल्ली के नेताओं को दाल में काला क्यों नज़र आ रहा है?जब सरजी दिल्ली में ‘दिल्ली बोले दिल से,ऑड-इवन फिर से’ कर रहे थें,तब भी लोगों को परेशानी हुई थी,मगर लोगों ने इसे स्वीकारा तो आज आपको क्या दिक्कत हो गयी गयी सर?आप कह रहे हो की दिल्ली सरकार बहुत काम कर रही है।मैं भी यही कहता हूँ।आपकी दिल्ली सरकार पहले जूता कांड,स्याही कांड और थप्पड़ कांड जैसे काम के लिए विख्यात थी मगर आपके नेताओं ने इससे अपना स्तर उठाया,मेहनत की और ‘सेक्स कांड’ तक पहुँचे,कुछ तो फ़र्ज़ी डिग्री तक रखते पकड़े गए।
 
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बीबीसी के पत्रकार के सामने ज़रूरत से ज़्यादा आक्रामक तेवर
बीबीसी के पत्रकार के सामने ज़रूरत से ज़्यादा आक्रामक तेवर दिखाना हो या फिर पूरे देश की मीडिया को दलाल कहना,उनकी ये हरकतें सच में न सिर्फ दिल्ली की जनता अपितु देश की राजनीती को भी शर्मसार करती है।समाजसेवा में पुरस्कार प्राप्त किया हुआ व्यक्ति जब एक अफवाह कर्मचारी जैसा व्यवहार करता है तो देखना सच में बहुत अजीब होता है।उनके अभी एक नेता जिसकी तरफदारी करते हुए उन्होंने ट्वीट किया था कि ‘मोदी भगवंत मान से डरता है,इसीलिए उसे बाहर करता है’,उनके वो सांसद भी संसद की सुरक्षा से खिलवाड़ करने के आरोप में पूरे शीतकालीन सत्र से निष्कासित कर दिए गए हैं क्योंकि उनपर ये आरोप सिद्ध हो गए हैं,और केजरीवाल अब भी इसपर छाती ठोकते हैं?
नेता बनने से पहले उनकी ज़ुबान पर भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार रहता था,मगर अब उनकी ज़बान से ‘मोदी जी’ उतरते ही नही?